बलराम जयंती पर बन रहे हैं ये शुभ योग, पंचांग से जानें आज का मुहूर्त

आज यानी शुक्रवार 29 अगस्त के दिन भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है। इस तिथि पर बलराम जयंती मनाई जाएगी, जिसे बलदेव छठ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसे में चलिए पंचांग (Aaj ka Panchang 29 August 2025) से जानते हैं आज का शुभ समय और राहुकाल का समय।

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि समाप्त – रात 8 बजकर 21 मिनट तक
ब्रह्म योग – दोपहर 2 बजकर 13 मिनट तक
करण –
कौलव – सुबह 7 बजकर 8 मिनट तक
तैतिल – रात 8 बजकर 21 मिनट तक
वार – रविवार

सूर्योदय और सूर्यास्त का समय
सूर्योदय – सुबह 5 बजकर 58 मिनट से
सूर्यास्त – शाम 6 बजकर 46 मिनट पर
चंद्रोदय – सुबह 11 बजकर 18 मिनट से
चंद्रास्त – रात 10 बजे
सूर्य राशि – सिंह
चंद्र राशि – तुला

शुभ समय
अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 11 बजकर 56 मिनट से दोपहर 12 बजकर 47 मिनट तक
अमृत काल – प्रातः 4 बजकर 44 मिनट से देर रात 6 बजकर 31 मिनट तक

अशुभ समय
राहुकाल – सुबह 10 बजकर 46 मिनट से दोपहर 12 बजकर 22 मिनट तक
गुलिकाल – सुबह 7 बजकर 34 मिनट से सुबह 9 बजकर 10 मिनट तक
यमगण्ड – दोपहर 3 बजकर 34 मिनट से शाम 5 बजकर 10 मिनट तक

आज का नक्षत्र
आज चंद्रदेव स्वाति नक्षत्र में रहेंगे…
स्वाति नक्षत्र: रात 11 बजकर 38 मिनट तक

सामान्य विशेषताएं: स्वतंत्र स्वभाव, लचीलापन, शिष्टाचार, बुद्धिमत्ता, आत्मसंयम, समाजप्रियता, संवेदनशीलता, शांत स्वभाव, शालीनता और आकर्षक व्यक्तित्व
नक्षत्र स्वामी: राहु
राशि स्वामी: शुक्र
देवता: वायु देव (पवन देवता)
प्रतीक: हवा में झुकती हुई एक नई कली
आज का व्रत और त्योहार – बलराम जयंती

बलराम जयंती का महत्व
बलराम जयंती केवल श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम के जन्म का पर्व नहीं है, बल्कि इसे शक्ति, धर्म और कर्तव्यनिष्ठा का उत्सव भी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं व्रत करती हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति होती है। जिन दंपत्तियों को संतान नहीं है, उनके लिए यह व्रत बहुत ही लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा, यदि किसी बच्चे को रोग या कष्ट हो, तो इस व्रत से उसे लाभ मिलता है।

बलराम जयंती अवधि-
षष्ठी तिथि प्रारंभ – 28 अगस्त 2025 को शाम 05 बजकर 56 मिनट तक
षष्ठी तिथि समाप्त – 29 अगस्त 2025 को रात 08 बजकर 21 मिनट तक

बलराम जयंती पूजा विधि –
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करें फिर पूजा स्थल को साफ करें।
पूजा स्थल की दीवार को गोबर से लीपें और भैंस के घी में सिंदूर मिलाकर हलषष्ठी माता का चित्र बनाएं।
पूजा घर के पास मिट्टी का छोटा तालाब बनाकर उसे पानी से भर दें।
पलाश की टहनी, कुश घास और झरबेरी के झाड़ को जोड़कर हरछठ बना लें।
चौकी पर मिट्टी से बनी गौरी, गणेश, शिव और कार्तिकेय की प्रतिमाएं स्थापित करें।
पूजा समाप्ति के बाद प्रसाद का वितरण करें।
हलषष्ठी देवी को भुना हुआ महुआ, धान का लावा, भुना हुआ चना, गेहूं और अरहर का भोग अर्पित करें।

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